শ্রীশ্রীকাল্কি মহাৠষি মালোবাবা(তাপস)/ श्रीश्रीकाल्कि महाॠषि मालोबाबा (तापस)

লেখক-পরিচিতি
শ্রীশ্রীকাল্কি মহাঋষি মালোবাবা [তাপস]
শ্রীশ্রীকাল্কি মহাঋষি মালোবাবা [তাপস] “মহাবেদ সংহীতা” গ্রন্থের রচয়িতা। তাঁর রচনায় মানবজীবনের অন্তর্নিহিত সত্য, আত্মঅনুসন্ধান, ব্রহ্মজ্ঞান, ভক্তি, ধ্যান, কর্ম, প্রেম, করুণা, সেবা ও মুক্তির সাধনা—এই বিষয়গুলো গুরুত্ব পেয়েছে।
लेखक-परिचय
श्रीश्री काल्कि महाऋषि मालोबाबा [तापस]
श्रीश्री काल्कि महाऋषि मालोबाबा [तापस] “महावेद संहिता” ग्रंथ के रचयिता हैं। उनकी रचनाओं में मानव जीवन के अंतर्निहित सत्य, आत्म-अन्वेषण, ब्रह्मज्ञान, भक्ति, ध्यान, कर्म, प्रेम, करुणा, सेवा एवं मुक्ति की साधना—इन विषयों को विशेष महत्व दिया गया है।

তাঁর দর্শনে মানুষের বাহ্যিক পরিচয়ের ঊর্ধ্বে মানবসত্তার মর্যাদা বিশেষভাবে আলোচিত হয়েছে। এই দৃষ্টিভঙ্গির ভিত্তিতে তিনি “সাবর্ণী মনুষ্যধর্ম্ম”-কে সত্য, প্রেম, করুণা, সেবা ও ঐক্যচেতনার সঙ্গে সম্পর্কিত একটি নৈতিক ও আধ্যাত্মিক সাধনা হিসেবে ব্যাখ্যা করেছেন।
उनके दर्शन में मनुष्य की बाहरी पहचान से ऊपर मानव-सत्ता की गरिमा को विशेष रूप से महत्व दिया गया है। इसी दृष्टिकोण के आधार पर उन्होंने “सावर्णी मनुष्यधर्म्म” को सत्य, प्रेम, करुणा, सेवा और एकता की चेतना से जुड़ी एक नैतिक एवं आध्यात्मिक साधना के रूप में व्याख्यायित किया है।



“মহাবেদ সংহীতা” গ্রন্থে এই ভাবনাগুলোকে একটি সুসংবদ্ধ দার্শনিক কাঠামোর মধ্যে উপস্থাপনের চেষ্টা করা হয়েছে। গ্রন্থটিতে আধ্যাত্মিক জ্ঞানকে তাত্ত্বিক আলোচনার পাশাপাশি দৈনন্দিন জীবন, চরিত্রগঠন, সাধনা, ভক্তি, ধ্যান, কর্ম ও আত্মোন্নতির সঙ্গে যুক্ত করা হয়েছে।
“महावेद संहिता” ग्रंथ में इन विचारों को एक सुव्यवस्थित दार्शनिक ढाँचे के भीतर प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। इस ग्रंथ में आध्यात्मिक ज्ञान को केवल सैद्धांतिक चर्चा तक सीमित न रखते हुए, उसे दैनिक जीवन, चरित्र-निर्माण, साधना, भक्ति, ध्यान, कर्म एवं आत्मोन्नति से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है।
লেখকের আলোচনায় “অক্ষরব্রহ্ম”, “অন্তঃস্থিত ব্রহ্ম”, “তাপসতত্ত্ব”, “ভক্তি”, “ধ্যান”, “কর্ম” এবং “মোক্ষ” মানবজীবনের সমন্বিত সাধনাপথের পরস্পরসম্পর্কিত দিক হিসেবে বিবেচিত হয়েছে।
लेखक की विचारधारा में “अक्षरब्रह्म”, “अंतःस्थित ब्रह्म”, “तापस तत्त्व”, “भक्ति”, “ध्यान”, “कर्म” तथा “मोक्ष” को मानव जीवन की समन्वित साधना-पथ के परस्पर संबंधित आयामों के रूप में माना गया है।



গ্রন্থটির উদ্দেশ্য কোনো নির্দিষ্ট মতবাদ গ্রহণে পাঠককে বাধ্য করা নয়; বরং আত্মপর্যালোচনা, প্রশ্ন, বিচারবোধ এবং জীবনে সত্য ও নৈতিকতার অনুশীলনের প্রতি উৎসাহিত করা। লেখক নিজেকে এই অনুসন্ধানের একজন তাপস-সাধক ও পথপ্রদর্শক হিসেবে উপস্থাপন করেছেন। তাঁর ভাবনায় জ্ঞান চিন্তার বিষয়, ভক্তি হৃদয়ের বিষয়, কর্ম জীবনের বিষয় এবং ধ্যান অন্তর্জাগরণের একটি মাধ্যম।
ग्रंथ का उद्देश्य पाठक को किसी विशिष्ट मत या विचारधारा को स्वीकार करने के लिए बाध्य करना नहीं है; बल्कि आत्मचिंतन, प्रश्न, विवेक-बुद्धि तथा जीवन में सत्य और नैतिकता के अभ्यास के प्रति प्रेरित करना है। लेखक स्वयं को इस खोज और आत्म-अन्वेषण की यात्रा में एक तापस-साधक एवं मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
उनके विचारों में ज्ञान चिंतन का विषय है, भक्ति हृदय का विषय है, कर्म जीवन का विषय है और ध्यान अंतर्जागरण का एक माध्यम है।
অন্যান্য মূল গ্রন্থ গুলির তালিকা: / अन्य प्रमुख ग्रंथों की सूची:
১। অক্ষরব্রহ্মযোগ – অক্ষরোপনিষদ্
২। শিবযোগ – শিবোপনিষদ্
৩। ভক্তিযোগ – গীতোপনিষদ্
৪। সূর্যযোগ – সূর্যোপনিষদ্
৫। চন্দ্রযোগ – চন্দ্রোপনিষদ্
৬। শক্তিযোগ – শক্তি উপনিষদ্
৭। নামযোগ – নামোপনিষদ্
৮। দর্শন ধ্যানযোগ – মহাবেদ সংহিতা
পঞ্চযজ্ঞহোমহুতি – বর্ষ সংহিতা এবং দৈব্যবর্ষ সংহীতা |
अन्य प्रमुख ग्रंथों की सूची
- अक्षरब्रह्म योग — अक्षरोपनिषद्
- शिव योग — शिवोपनिषद्
- भक्ति योग — गीता उपनिषद्
- सूर्य योग — सूर्योपनिषद्
- चंद्र योग — चंद्रोपनिषद्
- शक्ति योग — शक्ति उपनिषद्
- नाम योग — नामोपनिषद्
- दर्शन एवं ध्यान योग — महावेद संहिता | पंचयज्ञ होमाहुति — वर्ष संहिता एवं दैव्यवर्ष संहिता
এছাড়া দশনাম এবং অষ্টনাম শ্রীশ্রীকাল্কি নাম গান । इसके अतिरिक्त दशनाम एवं अष्टनाम तथा श्रीश्री काल्कि नाम-गान भी प्रमुख रचनाओं में सम्मिलित हैं।
- তাপসগীতা • মোক্ষোপনিষদ্ • শ্রীশ্রীকাল্কি গীতা | মহাবেদ সংহীতা ।
স্বাধ্যায়ণ = গবেষণা:
যে সকল ঈশ্বর সন্তান এই সকল যোগ দর্শন এবং শাস্ত্র নিয়ে পি.এইচ.ডি বা অধ্যাপনা করতে চান তাহারা স্বয়ংবল গুরুকুলে সংযুক্ত হোন। - तापस गीता • मोक्षोपनिषद् • श्रीश्री काल्कि गीता • महावेद संहिता
- स्वाध्याय = शोध
- जो भी ईश्वर-संतान इन सभी योग-दर्शन एवं शास्त्रों का अध्ययन करते हुए पीएच.डी. अथवा अध्यापन करना चाहते हैं, वे स्वयंबल गुरुकुल से जुड़ें।
এই দৃষ্টিকোণ থেকে “মহাবেদ সংহীতা” দর্শন, সাধনা ও মানবধর্মের পারস্পরিক সম্পর্ক নিয়ে রচিত একটি গ্রন্থ। আত্মঅনুসন্ধানী পাঠকের জন্য এটি আধ্যাত্মিক চিন্তা ও নৈতিক জীবনের বিভিন্ন দিক নিয়ে ভাবনার একটি পরিসর তৈরি করে।
इस दृष्टिकोण से “महावेद संहिता” दर्शन, साधना और मानवधर्म के पारस्परिक संबंधों पर आधारित एक ग्रंथ है। आत्म-अन्वेषण करने वाले पाठकों के लिए यह आध्यात्मिक चिंतन एवं नैतिक जीवन के विभिन्न आयामों पर विचार करने का एक व्यापक अवसर प्रदान करता है।
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মালোবাবা কী?

শ্রীশ্রীকাল্কি মহাৠষি মালোবাবার তত্ত্বে ব্যাক্ষা: শ্রীশ্রীকাল্কি পরমেশ্বর ভগবান পরম্বৈষ্ণব সদ্গুরু মহাৠষি মালোবাবা (তাপস মালো) | শ্রীশ্রীকাল্কি মহাৠষি মালোবাবা। একজন যোগী, যোদ্ধা, শিল্পী, লেখক, কবি, শ্বাস্ত্রবীদ্,আচার্য্য, স্ব-গায়েত্রী, স্ব-যন্ত্র, স্ব-মন্ত্রের অধীকারী,সত্য শাশ্বত্ মনুষ্যধর্ম্ম জাগরণকারী’। শ্রীশ্রীকাল্কি শ্রীমদ্ভগবদ্গীতা এবং মহাবেদ সহ ১৪টি উপনিষদ্ এবং ১০টি মহাযোগ তত্ত্বের প্রবর্ত্তা । নিত্য বর্ষসংহতা এবং দৈব্যবর্ষ সংহিতার রচনাকার, গণনাকারী এবং সাবর্ণী মন্বন্তর…
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গুরু এবং গুরুকূল

গুরু শব্দের অর্থ, ব্যুৎপত্তি এবং গুরুকুলের বিশদ আলোচনাভারতীয় বৈদিক, উপনিষদীয় ও আধ্যাত্মিক পরম্পরায় ‘গুরু’ এবং ‘গুরুকুল’ শব্দ দুটির বিশেষ তাৎপর্য রয়েছে। গুরু কেবল একজন শিক্ষক নন; ভারতীয় জ্ঞানপরম্পরায় তিনি শিষ্যকে বিদ্যা, বিচারবুদ্ধি, নৈতিকতা ও আত্মজিজ্ঞাসার পথে পরিচালিত করেন। আর গুরুকুল হলো এমন একটি শিক্ষাব্যবস্থা, যেখানে গুরু ও শিষ্য পরস্পরের সান্নিধ্যে থেকে শিক্ষা, অনুশীলন, চরিত্রগঠন এবং…
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নিয়ম ১.৪ !! মালোসংহীতা !! MaloSamhita !!

শ্রীশ্রীকাল্কি মহাৠষি মালোবাবার নিত্য নিয়ম কানুন ।নিয়ম ১.৪!!সূত্রঃ “চতুর্থুগে সমপদম্ শ্রীশ্রীকাল্কি চতুর্থুগনামং!মালোবাবায়ং প্রদও চতুর্থগনানকীর্ত্তনঃ নিত্যকুরুহং !!অর্থঃ ” শ্রীশ্রীকাল্কি মহাৠষি মালোবাবার প্রদত্ত চতুর্থ যুগনাম গুণকীর্তন এবং সমপদ মহাবেদ সংগীত নিত্যকর্ম্মে করা একান্ত প্রয়োজন।”ওঁ মালোবাবায়ং নমঃ !!১০০৮!! শ্বাস্ত্র নামঃ নিয়ম ১.৪ !! মালোসংহীতা !! MaloSamhita !!লেখকঃ শ্রীশ্রীকাল্কি মহাৠষি মালোবাবাপ্রকাশকঃ স্বয়ংবল গুরুকুল প্রকাশনিস্থানঃ শ্রীশ্রী কাল্কিশ্বর ধাম, শম্ভল ধাম(…
